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पांच महीने बाद ही बिहार विधानसभा के लिए चुनाव होने हैं। नीतीश कुमार
को साढ़े चार साल तक भाजपा के साथ बिहार की सरकार चलाने के बाद याद आया
है कि गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी के चित्र के साथ उनके
पोस्टर नहीं छपने चाहिए। इसके लिए भाजपा को उनकी इजाजत लेनी चाहिए थी।
यही नीतीश बाबू बड़े ही जोश-ओ-खरोश से पंजाब में नरेन्द्र मोदी के साथ
एक ही मंच पर खड़े होकर अपने फोटो खिंचवा कर आये थे मगर पटना में जब उनके
पोस्टर नरेन्द्र मोदी के साथ लगें तो उन्हें इसलिए एतराज हुआ कि
नरेन्द्र मोदी के माथे पर तो गुजरात दंगों का दाग लगा हुआ है। इससे
बिहार की जनता में उनके मुस्लिम विरोधी होने का संदेश जायेगा।

नीतीश बाबू क्या इस बात का उत्तर दे सकते हैं कि 2002 में जब गोधरा
रेलवे स्टेशन पर खड़ी ट्रेन में 27 फरवरी की रात को 56 कथित राम सेवक
हिन्दू यात्री जले थे तो उसकी प्रतिक्रिया में पूरे गुजरात में चुन-चुन
कर हजारों मुसलमानों का वध किया गया था तो नरेन्द्र मोदी किस पार्टी
में थे और बिहार के नीतीश बाबू किस पार्टी में थे और इन दोनों ही नेताओं
की पार्टियां मिल कर क्या गुल खिला रही थीं ? इसका जवाब है कि उस समय
नीतीश जी केन्द्र की भाजपा नीत वाजपेयी सरकार में रेलमन्त्री थे और जद
(यू) व भाजपा के केन्द्र की सरकार चलाने के लिए वैसा ही गठबन्धन था जैसा
आज बिहार में है। क्या सितम है कि जिस रेल हादसे की प्रतिक्रिया स्वरूप
पूरे गुजरात में मुसलमानों के कत्ल का नंगा नाच हुआ उसे नीतीश बाबू
चुपचाप बैछ कर देखते रहे। जबकि इसी गठबन्धन की सरकार में शामिल लोजपा
नेता रामविलास पासवान ने मन्त्री पद से इस्तीफा देकर नरेन्द्र मोदी को
बर्खास्त करने की मांग की थी।
क्या बिहार विधानसभा चुनावों से पहले वह इस राज्य की जनता को यह बताना
चाहते हैं कि उनका मुस्लिम प्रेम अचानक जागा है मगर अफसोस तो यह है कि
मुसलमान मतदाताओं के वोट को राजनीतिक दल एक उपभोक्ता सामग्री की तरह
देखते हैं। चुनावों से पहले जो जितना ज्यादा मुसलमानों पर जुल्म और उनके
पिछड़ेपन के बारे में बोले वही उनके वोट ले जाए। यह सरासर मुस्लिमों पर
अन्याय है और उनका अपमान भी है क्योंकि वे भी भारत के वैसे ही सम्मानित
नागरिक हैं जैसे कि अन्य सम्प्रदायों के लोग।
(पंजाब केसरी, 21 जून, 2010 दिल्ली
सम्पादकीय के कुछ प्रमुख अंश) |