Rashtriya Janata Dal :नीतीश कुमार का ट्रेजरी घोटाला
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नीतीश कुमार का ट्रेजरी घोटाला

पटना हाईकोर्ट ने बिहार के सरकारी खज़ाने से 11,412 करोड़ की निकासी संबंधी कथित वित्तीय गड़बड़ी की सीबीआई जाँच के आदेश 15 जुलाई, 2010 को दिए थे. पटना हाईकोट ने सीबीआई जांच के अपने पुराने आदेश को फिलहाल रोक दिया है. बिहार सरकार की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह आदेश दिया. (23 जुलाई, 2010, आज तक)
बिहार के महालेखाकार ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि सरकारी खज़ाने से निकाली गई इस राशि के खर्च के ज़रुरी विवरण न होने से बड़ी वित्तीय अनियमितता का संदेह होता है.
इस रिपोर्ट के आधार पर दायर एक जनहित याचिका पर दो दिन चली सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने इस मामले को केंद्रीय जाँच ब्यूरो यानी सीबीआई को सौंपने के आदेश दिए थे.
याचिकाकर्ता ने इस गड़बड़ी के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी सहित 13 मंत्रियों और मुख्यसचिव सहित कई अधिकारियों को मिलाकर कुल 47 लोगों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामला दर्ज करके उन पर मुक़दमा चलाने का अनुरोध किया था.

याचिका
"महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार योजना, इंदिरा आवास योजना और मध्यान्ह भोजन जैसी योजनाओं के लिए निकाली गई आकस्मिक राशि का कोई लेखाजोखा उपलब्ध न होना एक बड़ी गड़बड़ी का संदेह पैदा करता है."

महालेखाकार की रिपोर्ट
पटना हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश रेखा मनहरलाल दोशित और न्यायमूर्ति सुधीर कुमार कटरियार की एक खंडपीठ ने 15 जुलाई, 2010 को ये आदेश दिए थे.
ये आदेश वकील अरविंद कुमार शर्मा की जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद दिए गए.
महालेखाकार ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार योजना और मध्यान्ह भोजन जैसी योजनाओं के लिए निकाली गई राशि का सही लेखाजोखा उपलब्ध न होना एक बड़ी गड़बड़ी का संदेह पैदा करता है.
दरअसल यह मामला सरकारी खज़ाने से निकाली जाने वाली आकस्मिक राशि और उसके खर्च के विवरण दिए जाने से जुड़ा है.
नियमानुसार जब सरकार खज़ाने से किसी भी योजना के लिए राशि निकालती है तो एक विवरण दिया जाता है जिसे अग्रिम आकस्मिक विपत्र यानि एसी बिल कहा जाता है. जब यह राशि खर्च कर ली जाती है तब संबंधित अधिकारियों की ओर से एक पूरा विवरण जमा करवाया जाता है जिसे विस्तृत आकस्मिक विपत्र यानि डीसी बिल कहा जाता है.
"वर्ष 2007-08 में ही सरकारी खजाने से 3800 करोड़ रुपए निकाले गए जिसमें से सिर्फ़ 51 करोड़ रुपए का डीसी बिल जमा किया गया है और 3749 करोड़ रुपयों का कोई हिसाब उपलब्ध नहीं है"
जानकार लोगों का कहना है कि डीसी बिल से ही प्रमाणित होता है कि राशि सही मद में खर्च की गई है या नहीं. यह बिल छोटे प्रशासनिक अधिकारियों से होते हुए मुख्य सचिव और मंत्रियों सहित मुख्यमंत्री तक फ़ाइलों के ज़रिए पहुंचता है.
उनके अनुसार याचिकाकर्ता की ओर से अदालत से कहा गया है कि इतनी बडी़ राशि की गड़बड़ी मंत्रियों और आला अधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है।


स्रोत-बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम से श्री मणिकांत ठाकुर की रिपोर्ट के प्रमुख अंश।


मुमकिन है 60 दिनों में दो बच्चों की मां बनना?

जैसा कि सभी जानते हैं कि कोई महिला नौ महीने की प्रेगनेंसी के बाद बच्चे को जन्म देती है, लेकिन बिहार में सरकारी योजना के पैसे के बंदरबांट के लिए अजीबोगरीब कहानी गढ़ी गई। वहां कागज पर दिखाया गया कि 298 महिलाओं ने 60 दिन की अवधि में दो से पांच बच्चों को जन्म दिया। बच्चे के जन्म पर सरकारी योजना के तहत माताओं को दी गई राशि के रेकॉर्ड्स में यह बात पाई गई है।

नियंत्रक एवं महा लेख परीक्षक (कैग) की एक रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, जब कोई महिला बच्चे को जन्म देती है तो सरकार की जननी सुरक्षा योजना के तहत उसे करीब 1,000 रुपये दिए जाते हैं। लेकिन पाया गया कि 298 महिलाओं को इस योजना के तहत 6.6 लाख रुपये का भुगतान किया गया। दिखाया यह गया कि उन्होंने 60 दिनों के अंदर दो से पांच तक बच्चों को जन्म दिया। कैग रिपोर्ट 2009 के मुताबिक, ये अनियमितताएं साल 2008-09 के दौरान भागलपुर, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, किशनगंज और नालंदा जिलों में पाई गईं।

रिपोर्ट राज्य विधानसभा के मॉनसून सत्र के दौरान पेश की गई। रिपोर्ट के मुताबिक, संबंधित अधिकारियों ने जननी सुरक्षा योजना के तहत इन महिलाओं को 60 दिनों के दौरान दो से पांच बार तक भुगतान किया। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि अपने बच्चे को दूध पिलाने वाली हजारों माताओं को इस योजना का लाभ नहीं मिल सका है। कैग रिपोर्ट के मुताबिक, 4,70,307 नई माताओं में से 97,146 को फंड की कमी के कारण जननी सुरक्षा योजना के तहत कैश सहायता नहीं मिल पाई। विपक्षी नेताओं ने जननी सुरक्षा योजना पर अमल में भ्रष्टाचार के लिए राज्य सरकार और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की आलोचना की है।

हाई स्कूल में मिड डे मील : कैग रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राज्य के कई हाई स्कूलों में भी स्टूडेंट्स को मिड डे मील दिया गया, जबकि यह योजना हाई स्कूलों में लागू ही नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2009-10 में प्राइमरी स्कूलों में 1 करोड़ 38 लाख 5 हजार बच्चों को और हाई स्कूलों में 38 लाख 80 हजार बच्चों को मिड डे मील दिया गया।
स्रोत-नवभारत टाइम्स डॉट कॉम

 

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